क्या “महिला सशक्तिकरण” पर सरकार बदलने से कोई तालूक है, नरेंद्र मोदी की सरकार कितनी सख्त है इसे लेकर।
महिला सशक्तिकरण एक ऐसा मुद्दा है जिस पर आमतौर पर सभी चर्चा करते हुए मिल जाएंगे ,परंतु यहां यह जानना आवश्यक है इसके तहत जिन जिन लक्ष्य को निर्धारित किया गया था. क्या हमने उसे प्राप्त कर लिया है परंतु इससे पहले यह समझते हैं कि हमें महिला सशक्तिकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी?
साथ ही भारत की महिलाएं असफल क्यों है ?
अगर हम इस बात को समझ लेते हैं तो फिर हमें इस बात को समझते देर नहीं लगेगी कि भारत का नाम पूर्णत: विकसित देशों में अब तक शुमार क्यों नहीं है? सभी जानते हैं कि देश की कुल आबादी का आधा हिस्सा महिलाएं है, ऐसी स्थिति में महिलाओं की शिक्षा को ही तवज्जो ना दी जाए तो देश का हाल क्या होगा? शिक्षा ही वह रामबाण है जो नारियों को सशक्त एवं प्रशस्त तथा उनकी छुपी हुई प्रतिभा को निखारती है।
इस पहले पायदान पर औरतों की हालत दयनीय है। एक विकसित देश में महिलाओं की सहभागिता 71 % से 75 % तक होती है परंतु भारतीय अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी मात्र 4% है ।
अब सवाल उठता है कि ऐसा क्यों है ?आज जबकि भारत प्रगति कर रहा है तब भी महिलाओं को किसी बड़े पद पर या यूं कहें नौकरी देने में लोग कतराते हैं। कारण ,यह सोच कि कल को इसकी शादी हो जाएगी ,गर्भवती हो जाएगी तो….. परंतु ऐसी दकियानूसी सोच वालों को यह समझ लेना चाहिए कि औरतें घर भी संभालती हैं और इतनी काबिलियत से देश की अर्थव्यवस्था भी। चुनौतियों से लड़ कर एक उदाहरण पेश किया है देश की कुछ महिलाओं ने जिन में शुमार हैं नैना लाल किडवाणी (ex director HSBC )शहनाज हुसैन, अरुंधति भट्टाचार्य (chairperson Kamani tubes ) क्या इन नारियों को आज किसी परिचय की जरूरत है ?

ऐसे में नारी को पुरुषों से कम समझने वालों को यह समझना चाहिए कि बेटा तो केवल एक परिवार को सुख देगा परंतु बेटियां दो परिवारों को तृप्त करेंगी ।अब सवाल यह खड़ा होता है कि क्या नारी सशक्तिकरण का जिम्मा सिर्फ हमारी सरकार के सिर है या फिर हम नारियों को इस उम्मीद में बैठे हैं कि हमारे सशक्तिकरण के लिए कोई उद्धार करता है या मसीहा आएगा? नहीं ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। सरकार ने औरतों के हित से जुड़ी अनेक नीतियां तथा योजनाएं बनाई हैं ।जरूरत है इन सभी को जानने -समझने के उपरांत उनका भरपूर लाभ उठाने की ।जब तक औरतें अपने आप में सशक्त नहीं बनेंगे तब तक नारी सशक्तिकरण पर सिर्फ चर्चाएं ही होंगी, इस पर अमल भी हम नारियों को ही करना है साथ ही इसे अपनाना भी है ।अद्भुत क्षमता तथा अदम्य साहस है हम नारियों में यह बात तो आजादी के समय रानी लक्ष्मीबाई ने ही सिद्ध कर दिया था। फिर भी अगर समाज औरतों के मनोबल पर प्रहार करता है तो हम नारियों को “BOUNCE BACK” की नीति अपना कर समाज को मुंहतोड़ जवाब देने की जरूरत है।
नेहा जी के कलम से।

